Saturday, July 25, 2015

अष्टविनायाक यात्रा, एक अविस्मरणीय अनुभव


 
भगवान श्री गणेश के असंख्य स्थानो में  ८ स्थानो को विशिष्ठ स्वरूप में फलदायी एवं मनोकामना पूर्ति का प्रतिक  माना गया हैं।  इन  स्थानो  को अष्टविनायक के उपाधि से सम्बोधित  किया जाता हैं. यह ८ स्थानो में से बहुदा स्थान महारष्ट्र के पुणे नगर के सानिध्य में स्थापित हैं. भगवन शिव के १२ ज्योतिर्लिंग एवं देवी के ५२ पीठो के सामान यह गणेशजी के अष्ठ स्थान प्राचीन हैं  एवम इनकी गणना स्वयंभू स्थनो मैं होती हैं। यह ८ स्थानो का वर्णन हमें इस सूत्र द्वारा ज्ञात होता हैं.



यह सुत्र वंदना बहुधा धार्मिक समारम्भो में की जाती हैं जिसके द्वारा गणेशजी को आमंत्रित किया जाता हैं. यद्यपि अष्टविनायक मंदिर अतिप्राचीन होने की पूर्ति हमें गणेश एवं मुद्गल पुराणो से होती हैं तथापि इन मंदिरों की वर्त्तमान रचना अर्वाचीन वास्तुकला पर आधारित हैं. इस वस्तुस्थिति का प्रमुख कारण हैं  पेशवे जो गणेश भक्त हुआ करते थे और उनके राज्यकाल में श्री मौर्या गोस्वामी नमक एक विशिष्ट व्यक्ति के प्रयास से इन मंदिरों की पुनःरचना की गयी.